नहीं मंज़ूर

दिल को समझाने को मेरी जान ख्याल अच्छा है
कविता में पिरोकर तालियां बजवाने के लिए अच्छा है

तुम्हारी ऊंची उड़ान तुम्हारी पहचान है सर माथे पर
तुम्हारी उम्मीद पर खरा होने में न रखूँगा कोई कसर
लेकिन अगर है शर्त यही अपने रिश्ते की तो नहीं मंज़ूर
तुम्हारे इल्ज़ामात पर मैं समझता हूँ के मेरा नहीं कुसूर

मैंने कब रोका तुम्हें ऊंची उड़ान भरने आसमां छूने से
बदलाव कोई सुनामी नहीं प्रकृति है होता है धीरे धीरे से
दायरे मेरे नहीं समाज के हैं जिनसे हम दोनों ही बंधे हैं
ये बंधन मैंने नहीं बांधे सदियों की रवायतों से बांधे हैं

उड़ान पंछी की हो जो शाम को घर वापस आता है
उड़ो मत गुब्बारे की तरह जो ऊपर ही फट जाता है
तुम्हारी साड़ी सूट या स्कर्ट पहनने से मुझे क्या गर्ज
बात हम दोनो के सम्मान की है समझाना है मेरा फ़र्ज़

तुम्हें जीवन साथी नहीं रोबॉट या रबर का पुतला चाहिए
में मेरे हाल पर अच्छा हूँ तुमसे मुझे कुछ नहीं चाहिए
अब घर जाओ मेरी बात समझना उस पर गौर करना
कोई मिले ऐसा तो उसकी हो लेना न देर करना

दिल को समझाने को मेरी जान ख्याल अच्छा है
कविता में पिरोकर तालियां बजवाने के लिए अच्छा है

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s