बादशाह बेगम गुलाम और हुकम का इक्का

बिना बेगम के बादशाह
बहुत अकेला महसूस करता था

बेगम का इंतकाल हुए
बरसों बीत गए थे
बादशाह का एक बेटा था, शादीशुदा
जो बहु बेगम के इश्क़ में
इस कदर गिरफ्तार था
कि ज़माने वाले उसे
जोरू का गुलाम कहते थे
बादशाह ने कई बार उसे
समझाने की कोशिश की
मगर नाकाम रहा
बेटे की बेरुखी की वजह से
बादशाह और भी अकेला हो गया था
उसका गम बांटने वाला कोई न था

एक रात पास की रियासत से
बेगम साहिबा तशरीफ़ लायी
बेगम के साथ उसका
सिपहसालार भी था
बेगम साहिबा बेवा थी
और अकेली भी, बादशाह की तरह
यानी जोरू के गुलाम के
अब्बाजान की तरह

बादशाह ने दिल खोल कर
बेगम का इस्तकबाल किया
बेगम को बादशाह की मेजबानी
इतनी पसंदआयी कि
वह वहीं रहने लगी और
धीरे धीरे बादशाह के करीब
और करीब आती चली गयी
बाड़शाह भी बेगम के इश्क़ में
खोकर अपना दर्द भूल गया

बेगम मगर किसी ख़ास मकसद से
बादशाह के करीब आयी थी
धीरे धीरे उसने बादशाह के
सारे राज फाश कर लिए
और सल्तनत की सारी
खामियां और राज हासिल कर लिए
और फिर सिपाहसालार से मिलकर
बादशाह की सल्तनत पर
हमला करवा दिया
जिसमें बादशाह की
करारी हार हुई

दरअसल सिपाहसालार
कोई मामूली इंसान नहीं था
वह साजिश का हिस्सा था
और बेगम का करीबी भी
यानी जैसे हुकम का इक्का
अब वह बेताज बादशाह बन गया था
और बादशाह मोहताज हो गया था

इस कहानी में बाड़शाह कहीं का है
बेगम किसी और की है
गुलाम जोरू का है
हुकम का इक्का कोई और है
यानी किसी का किसी से
कोई रिश्ता नहीं है
मगर फिर भी वे हैं
बादशाह बेगम गुलाम
और हुकम का इक्का

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