रूबरू

रूबरू हो तुम एहसास जानलेवा है
छू लिया तुमने क़यामत हो गयी है

शब्-ए-दीदार है हटती नहीं निगाहें
कहीं खो न दें तुम्हें पत्थर हो गयी हैं

आपके ख़यालों में गुज़रती हैं शामें
ख़्वाब-ओ-तस्सवुर में सुलह हो गयी है

ज़माने से आशना हैं पर डरता है दिल
अब छुपाए न बने मुश्किल हो गयी है

सर-ए- महफ़िल तलाश है किसकी
और किसकी नज़रें कायल हो गयी हैं

मेरे अंदाज़ पर पुरज़ोर हंस देना तेरा
मानो न मानो मुहब्बत हो गयी है

तुम तुम न रहो रहूं मैं भी मैं नहीं
तवारीख बनने की वजह हो गयी है

2 thoughts on “रूबरू”

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