कवि की कल्पना

कवि तेरी कल्पना की उड़ान
पल में लांघती पर्वत, झरने,
नदियां, समंदर, तालाब,
खेत-खलिहान, ऊंचे मकान
न जाने कितने नगर और ‘बाद’
पहुँचती लहराती
सुदूर आकाश
बादलों के पास
और वहां
जहाँ न पहुंचे रवि
मगर हे कवितेरी
तेरी कल्पना की यह ऊंची छलांग
गर्वान्वित उड़ान
अब भी अधूरी है
अब भी है भटकान अपूर्णता की छवि है
इसलिए तू कवि है

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